इक नज़र फिर दश्तो सहरा घूमते रह जाइए
एक जाम और ज़िन्दगी भर झूमते रह जाइए
हुस्न ऐसा अप्सराएं जल मरें पानी भरें
मन करे नक्शे कफ़े पा चूमते रह जाइए
संदली क़ामत क़यामत से नहीं जिसकी नज़ीर
जामुनी ऑंखें जिन्हें बस देखते रह जाइए
एक बार उलझी अगर दिल से सुलझने की नहीं
ज़ुल्फ़ है या राज़े हस्ती खोलते रह जाइए
क्या न कहना था कहा क्या उनसे कहने क्या गए
सोचने बैठे कहीं फिर सोचते रह जाइए
दे दिया दस्ते हिनाई क्यों किसी के हाथ में
अपने हाथों की लकीरें पीटते रह जाइए
कर गुज़रना फ़र्ज़ था लेकिन किया कुछ भी नहीं
बोलना है आपका हक़ बोलते रह जाइए
नींद की लेते रहे काफ़िर बराबर गोलियाँ
क़ब्र में अब ता क़मायत ऊंघते रह जाइए
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