Wednesday, March 8, 2023


इक नज़र फिर दश्तो सहरा घूमते रह जाइए

एक जाम और ज़िन्दगी भर झूमते रह जाइए

 

हुस्न ऐसा अप्सराएं जल मरें पानी भरें

मन करे नक्शे कफ़े पा चूमते रह जाइए


संदली क़ामत क़यामत से नहीं जिसकी नज़ीर

जामुनी ऑंखें जिन्हें बस देखते रह जाइए


एक बार उलझी अगर दिल से सुलझने की नहीं

ज़ुल्फ़ है या राज़े हस्ती खोलते रह जाइए


क्या न कहना था कहा क्या उनसे कहने क्या गए

सोचने बैठे कहीं फिर सोचते रह जाइए


दे दिया दस्ते हिनाई क्यों किसी के हाथ में 

अपने हाथों की लकीरें पीटते रह जाइए


कर गुज़रना फ़र्ज़ था लेकिन किया कुछ भी नहीं 

बोलना है आपका हक़ बोलते रह जाइए


नींद की लेते रहे काफ़िर बराबर गोलियाँ

क़ब्र में अब ता क़मायत ऊंघते रह जाइए

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