न वहम गया न यकीं मिला अजब ईनो-आँ में उमर गई
न कहीं तुम्हारी खबर मिली न कभी हमारी खबर गई
कभी दीन में कभी कुफ़्र में कुछ इधर गई कुछ उधर गई
न गुजरने वाली गुज़ार दी जो गुज़र सकी वो गुज़र गई
जो तेरे फ़िराक़ में पी-पिला के जहाँ से जी को उठा लिया
ख़ुश इसी बहाने ख़ुदा हुआ चलो आक़बत तो संवर गई
जिसे हम समझते थे राहबर जिसे हम बताते थे मा'तबर
वो निगाह अबके बदल गई वो ज़ुबान कहके मुकर गई
चलें फ़ज्र ही पढ़ें साक़िया तेरे मैगुसार करें तो क्या
तेरी ख़म्र-ए-सख्त़-ख़ुमार तो महज़ एक शब में उतर गई
हमें इल्म है कि हमारी अक्ल की ता'ज़ियत में गए थे हम
सरे-कारे मुल्क बताओ क्या कि हमारी रूह भी मर गई
तुझे ख़ाके हिन्द हुआ है क्या तेरे रिन्द हो गए पारसा
दरे-गोर तेरे सनम हुए तेरे काफ़िरों की क़दर गई
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