रौज़ने दिल भी मेहरबान बुझाते जाओ
जिंदगानी मेरी आसान बनाते जाओ
इंक़लाबात के इमकान मिटाते जाओ
फिर न उट्ठे कोई तूफ़ान दबाते जाओ
आज तो खुल के मिलो पास रहो बात करो
इस मुलाक़ात को ज़ीशान बनाते जाओ
रस्म रोने की बची और सिसकने का रिवाज
इश्क़ के आखिरी अरकान निभाते जाओ
याद करने का अहद है न भुलाने की क़सम
कोई अपराध नहीं था कि छुपाते जाओ
उम्र की क़ैद ने चंदां तो उतारे होंगे
रह गए कौन से एहसान गिनाते जाओ
दस्तखत किसके हैं काफ़िर के अदम नामे पर
कौन है नाशिरे फरमान सुनाते जाओ
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