तुम आ गए हो मगर ज़िंदगी नहीं पहुँची
मुझे ख़बर है दु'आ की घड़ी नहीं पहुँची
अभी तलक मुझे दावत तेरी नहीं पहुँची
बरोज़े हश्र न कहना मेरी नहीं पहुँची
न इसको सम्त पता है न राह मंज़िल की
ये भागती हुई दुनिया कहीं नहीं पहुंची
जो दिल में आके ठहर जाए मिस्ले जानानः
किसी को आज तक ऐसी ख़ुशी नहीं पहुँची
घुमा फिरा के वही बात लिख रहा हूं मैं
जो बात मेरे लबों तक कभी नहीं पहुँची
भली थीं सूरतें कुछ कुछ बुरी रही होंगी
गए तो साथ भली क्या बुरी नहीं पहुँची
चला रहा हूं तदाबीर से मैं काम अपना
अभी मक़ामे खुदा तक ख़ुदी नहीं पहुंची
इसी नफ़स में तुम्हारा वुजूद है काफ़िर
न पस न पेश कभी ज़िन्दगी नहीं पहुँची
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