हारे मगर समझ गए हम शाहो मात को
मुहरे बदल के फिर से बिछाओ बिसात को
इक मो'जिज़ा है अक़लो फहम से मगर ब'ईद
कब से समझ रहा हूँ तेरी काइनात को
टखनों से फौक़ रेशमी तहमद बनी रहे
फिर दिल में चाहे पूजिए लातो मनात को
है शायरी दक़ीक़ लफ़ाज़ी में बतकही
समझे कोई इशारे, इशारों में बात को
और इश्क़ क्या है एक ख़लल है दिमाग़ का
ख़ाली जगह पसंद है इस वाहियात को
दोनों की ज़िन्दगी में न थीं क़बले ज़ौजियत
सुलझा रहे हैं रोज़ उन्हीं मुश्किलात को
पाया जिन्होंने दुर्रे नफ़स बहरे नफ्स में
आसानियों से कर गए नामुम्किनात को
तिल है कि उँगलियों ने लगाया है दाग़-वाग़
उनको निहारता हूँ कभी अपने हाथ को
निन्यानवे के फेर में काफ़िर उलझ गया
अब दिन को जागता है न सोता है रात को