Tuesday, March 21, 2023


हारे मगर समझ गए हम शाहो मात को

मुहरे बदल के फिर से बिछाओ बिसात को


इक मो'जिज़ा है अक़लो फहम से मगर ब'ईद

कब से समझ रहा हूँ तेरी काइनात को


टखनों से फौक़ रेशमी तहमद बनी रहे

फिर दिल में चाहे पूजिए लातो मनात को


है शायरी दक़ीक़ लफ़ाज़ी में बतकही

समझे कोई इशारे, इशारों में बात को 


और इश्क़ क्या है एक ख़लल है दिमाग़ का

ख़ाली जगह पसंद है इस वाहियात को


दोनों की ज़िन्दगी में न थीं क़बले ज़ौजियत

सुलझा रहे हैं रोज़ उन्हीं मुश्किलात को


पाया जिन्होंने दुर्रे नफ़स बहरे नफ्स में

आसानियों से कर गए नामुम्किनात को


तिल है कि उँगलियों ने लगाया है दाग़-वाग़

उनको निहारता हूँ कभी अपने हाथ को


निन्यानवे के फेर में काफ़िर उलझ गया

अब दिन को जागता है न सोता है रात को 

Sunday, March 19, 2023


तुम आ गए हो मगर ज़िंदगी नहीं पहुँची

मुझे ख़बर है दु'आ की घड़ी नहीं पहुँची


अभी तलक मुझे दावत तेरी नहीं पहुँची

बरोज़े हश्र न कहना मेरी नहीं पहुँची


न इसको सम्त पता है न राह मंज़िल की

ये भागती हुई दुनिया कहीं नहीं पहुंची


जो दिल में आके ठहर जाए मिस्ले जानानः 

किसी को आज तक ऐसी ख़ुशी नहीं पहुँची


घुमा फिरा के वही बात लिख रहा हूं मैं

जो बात मेरे लबों तक कभी नहीं पहुँची


भली थीं सूरतें कुछ कुछ बुरी रही होंगी

गए तो साथ भली क्या बुरी नहीं पहुँची


चला रहा हूं तदाबीर से मैं काम अपना

अभी मक़ामे खुदा तक ख़ुदी नहीं पहुंची


इसी नफ़स में तुम्हारा वुजूद है काफ़िर 

न पस न पेश कभी ज़िन्दगी नहीं पहुँची

दिल दुखाने की बात मत पूछो

उठ के जाने की बात मत पूछो


जब भी आओ घड़ी पहर ठहरो

वरना आने की बात मत पूछो


हम से वादा करो अगर कोई

फिर निभाने की बात मत पूछो


चोट खाने की बात मत पूछो

मुस्कराने की बात मत पूछो


दोस्तों का है फर्ज़ दिलजूई

दिल जलाने की बात मत पूछो


कुछ बहाना बना के छोड़ दिया

तुम बहाने की बात मत पूछो


वो ज़माना गुज़र गया हमदम

उस ज़माने की बात मत पूछो


अपनी मर्ज़ी से कौन आता है

कैदखाने की बात मत पूछो


उठ गया जब भी उठ गए हम भी

आबो दाने की बात मत पूछो


काफ़िर अब तक तो मर खपा होगा

उस दिवाने की बात मत पूछो

Monday, March 13, 2023

 

یہ شراب و شباب کی باتیں

بے سبب، بے حساب کی باتیں

 

الفت و انتساب کی باتیں

راحت و اضطراب کی باتیں

 

وصل کا شور، ہجر کا ماتم

شاعروں کے نصاب کی باتیں

 

آسمان و زمیں ملا دیں گے

سُنئے عالی جناب کی باتیں

 

عقل و منطق سے خام تقریریں

عمل سے اجتناب کی باتیں

 

خشک سالی میں آپ لکھتے ہیں

گلشنِ گُل شہاب کی باتیں

 

مرغ و نان و کباب و بریانی

چھوڑیے انقلاب کی باتیں

 

پیٹ جنت بھی ہے جہنم بھی

کیا حساب و کتاب کی باتیں

 

آپ کے منہ سے بھی، مَعَاذَ اللّٰہ

اب ثواب و عتاب کی باتیں

 

بات ہے کم بخت کی باتوں میں

کافرِ لاجواب کی باتیں

यह शराबो शबाब की बातें

बेसबब बेहिसाब की बातें


उल्फ़तो इंतेसाब की बातें

राहतो इज़्तिराब की बातें


वस्ल का शोर हिज्र का मातम

शायरों के निसाब की बातें


आसमानो ज़मीं मिला देंगे 

सुनिए आली जनाब की बातें


अक़लो मंतिक़ से ख़ाम तक़रीरें

अमल से इज्तिनाब की बातें


ख़ुश्क साली में आप लिखते हैं

गुलशने गुल शहाब की बातें


मुर्गो नानो कबाबो बिरयानी

छोड़िए इंक़िलाब की बातें


पेट जन्नत भी है जहन्नुम भी 

क्या हिसाबो किताब की बातें


आप के मुंह से भी, म'आज़ल्लाह

अब सवाबो इताब की बातें


बात है कमबखत की बातों में

काफ़िरे लाजवाब की बातें

Sunday, March 12, 2023

इतना प्यार कहाँ से लाऊँ

बीच हमारे गहरे धारे

फ़र्क़ तुम्हें कैसे समझाऊं

तुम इस पार नहीं आओगी 

मैं उस पार कहाँ से जाऊँ

        तुमको भी दूं मैं भी रक्खूँ

        इतना प्यार कहाँ से लाऊँ


एक ज़माना था जब मेरा 

मन संगीत सुना करता था

ख़ुशहाली के हरियाली के 

सुख के गीत बुना करता था 

        ज़िम्मेदारी में दब दब कर

        ब्योपारी बन गया क़लन्दर

तन का जंतर तो बन जाए 

मन के तार कहाँ से लाऊँ

        तुमको भी दूं मैं भी रक्खूँ


रोज़गार भी ऐसा मेरा

चैन तो है नामूस नहीं है

रोटी दाल के लाने काफ़ी

आमदनी है घूस नहीं है

        पूछ परख उनकी दुनिया में

        मारें या जूती चमकाएँ

दौलत शोहरत सबक़त इज्ज़त

आख़िरकार कहाँ से लाऊं

        तुमको भी दूं मैं भी रक्खूँ


क्या कहते हैं इस मसकन को

जिस में यकता मैं रहता हूँ

छत है कुछ दीवारें भी हैं

इसको ही मैं घर कहता हूँ

        कौन आता है दरवाज़ों से

        घर बनता है आवाज़ों से

मैं लक्कड़ पत्थर का बासी

घर संसार कहाँ से लाऊँ

        तुमको भी दूं मैं भी रक्खूँ


मेरे आंगन में बजते हैं

फल शिरीष के सूखे सूखे

केम नीम गुलमोहर सहजन

पेड़ खड़े हैं कुछ टेसू के

        सर्दी गर्मी एक सी माया

        आधी धूप है आधी छाया

दौलतमंद नज़र आने को 

चीड़ चिनार कहाँ से लाऊँ

        तुमको भी दूं मैं भी रक्खूँ


मुझसे मिलने आना है गर 

तुम्हें यहीं पर आना होगा 

ताजमहल या राजमहल में 

अपना कैसे जाना होगा 

        मीनारें दालान झरोके

        खून बहा था उनमें होक 

अज़मत देखूँ ताराजी में 

वो किरदार कहाँ से लाऊँ

        तुमको भी दूं मैं भी रक्खूँ

        इतना प्यार कहाँ से लाऊँ

Saturday, March 11, 2023

तूने बर्बाद हमारा चमनिस्तान किया

हमने आबाद तिरा कुर्रःए-वीरान किया


तूने क्या ख़ाक किया ख़ाक को इंसान किया

हमने जो संग तराशा उसे भगवान् किया


जान दी तूने सरासर मुझे ममनून किया

मैंने दी जान बराबर तेरा एहसान किया


कभी आईनो शरीयत कभी कुर'आनो हदीस

ख़ुद परेशान रहे जी को परेशान किया 


आज फिर हज़रते वाईज़ से किया मैंने सवाल

क्या ग़ज़ब तूने खुलूसे दिले नादान किया


ज़ीस्त और मौत के इस खेल का मक़सद क्या है

मुद्दतों ऐसे सवालात ने हैरान किया


हूं तो बीमार बहुत फिर भी गुनहगार नहीं

आबे गंगा से मुसलसल मैंने अशनान किया


गूनः गूनः ही भले रंगे चमन बूए चमन

तुझको सौगंध जो काफ़िर को मुसलमान किया 

Wednesday, March 8, 2023

 

रौज़ने दिल भी मेहरबान बुझाते जाओ

जिंदगानी मेरी आसान बनाते जाओ


इंक़लाबात के इमकान मिटाते जाओ

फिर न उट्ठे कोई तूफ़ान दबाते जाओ


आज तो खुल के मिलो पास रहो बात करो

इस मुलाक़ात को ज़ीशान बनाते जाओ


रस्म रोने की बची और सिसकने का रिवाज

इश्क़ के आखिरी अरकान निभाते जाओ


याद करने का अहद है न भुलाने की क़सम

कोई अपराध नहीं था कि छुपाते जाओ


उम्र की क़ैद ने चंदां तो उतारे होंगे

रह गए कौन से एहसान गिनाते जाओ


दस्तखत किसके हैं काफ़िर के अदम नामे पर

कौन है नाशिरे फरमान सुनाते जाओ


इक नज़र फिर दश्तो सहरा घूमते रह जाइए

एक जाम और ज़िन्दगी भर झूमते रह जाइए

 

हुस्न ऐसा अप्सराएं जल मरें पानी भरें

मन करे नक्शे कफ़े पा चूमते रह जाइए


संदली क़ामत क़यामत से नहीं जिसकी नज़ीर

जामुनी ऑंखें जिन्हें बस देखते रह जाइए


एक बार उलझी अगर दिल से सुलझने की नहीं

ज़ुल्फ़ है या राज़े हस्ती खोलते रह जाइए


क्या न कहना था कहा क्या उनसे कहने क्या गए

सोचने बैठे कहीं फिर सोचते रह जाइए


दे दिया दस्ते हिनाई क्यों किसी के हाथ में 

अपने हाथों की लकीरें पीटते रह जाइए


कर गुज़रना फ़र्ज़ था लेकिन किया कुछ भी नहीं 

बोलना है आपका हक़ बोलते रह जाइए


नींद की लेते रहे काफ़िर बराबर गोलियाँ

क़ब्र में अब ता क़मायत ऊंघते रह जाइए

Sunday, February 26, 2023


न वहम गया न यकीं मिला अजब ईनो-आँ में उमर गई

न कहीं तुम्हारी खबर मिली न कभी हमारी खबर गई


कभी दीन में कभी कुफ़्र में कुछ इधर गई कुछ उधर गई

न गुजरने वाली गुज़ार दी जो गुज़र सकी वो गुज़र गई


जो तेरे फ़िराक़ में पी-पिला के जहाँ से जी को उठा लिया

ख़ुश इसी बहाने ख़ुदा हुआ चलो आक़बत तो संवर गई


जिसे हम समझते थे राहबर जिसे हम बताते थे मा'तबर

वो निगाह अबके बदल गई वो ज़ुबान कहके मुकर गई


चलें फ़ज्र ही पढ़ें साक़िया तेरे मैगुसार करें तो क्या

तेरी ख़म्र-ए-सख्त़-ख़ुमार तो महज़ एक शब में उतर गई


हमें इल्म है कि हमारी अक्ल की ता'ज़ियत में गए थे हम

सरे-कारे मुल्क बताओ क्या कि हमारी रूह भी मर गई


तुझे ख़ाके हिन्द हुआ है क्या तेरे रिन्द हो गए पारसा 

दरे-गोर तेरे सनम हुए तेरे काफ़िरों की क़दर गई