चलो इक बार फिर से दोस्ती दोहराएँ हम दोनों
मैं फिर तुमसे कोई उम्मीद रक्खूं दिलनवाज़ी की
व तुम मेरी तरफ देखो ग़लत अंदाज़ नज़रों से
मेरे दिल की तमन्ना झिलमिलाये मेरी बातों में
बयां हो फिर तुम्हारी कशमकश का राज़ नज़रों से
चलो इक बार फिर से ..................
तुम्हें क्यों कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे क्यों लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं
मेरे हमराह क्यों रुस्वाइयां हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ क्यों गुजरी हुई रातों के साए हैं
चलो एक बार फिर से .............
त'आर्रुफ़ रोग बन जाए तो उसको फिर नया कर दें
त'आल्लुक़ बोझ बन जाए तो उसको हल्का सा कर दें
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ दे कर इब्तिदा कर दें
चलो इक बार फिर से........
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