मैंने सोचा भी नहीं था मेरी मेराजे हयात
ज़िन्दगी ऐसे मक़ामात से गुजरेगी कभी
मुझको मालूम नहीं था मेरी तन्हाई में
तेरे साँसों की हरारत तेरी बांहों का हिसार
होके हमरंग किसी रोज़ ठहर जाएगा
जिसको समझा था ख़सो ख़ाक का बोसीद: हुजूम
ख़ातिरे ज़ार का मक़दूर संवर जाएगा
आज हर शै तेरी अक्कास नज़र आती है
बज़्मे आलम को नया हुस्न मिला हो जैसे
सर निगूँ होके अदब करता है ख़ुर्शीदे मजाज़
और गीती है कि क़दमों में बिछी जाती है
एक शादाबी ओ सरशारिये गुल क्या कहिए
गुलसितां मुतरिबे नाज़ाँ मेरे ऐज़ाज़ में है
और यह सब है तेरा म' जिज़:ए लुत्फ़ो नियाज़
अपनी क़िस्मत पे जो मग़रूर हूँ मैं थोड़ा है
गर जो दीवाना ओ मसहूर हूँ मैं थोड़ा है
जिस क़दर भी तेरा मशकूर हूँ मैं थोड़ा है
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