Monday, January 15, 2024

शबे आख़िर

 अन्फ़ास के परिंदे बरहम नहीं रहेंगे

फ़िकरे हयातो ग़महाए ग़म नहीं रहेंगे

जानम तुम्हारे शैदाई कम नहीं रहेंगे

रह जाएगा ज़माना कल हम नहीं रहेंगे


तन्हाईए क़यामत और यह हुजूमे दुनिया

हाए हमारी क़िस्मत वाए रुसूमे दुनिया 

दुनिया के मुंसिफ़ों ने बस एक रात दी है 

यह रात आख़िरी है कल हम नहीं रहेंगे


रेगे रवां के पीछे शामो सहर गँवाए

परवाज़ की तमन्ना में बालो पर गँवाए

ख्व़ाबे कुहन की मंज़िल और काविशों का हासिल

यह रात है हमारी कल हम नहीं रहेंगे


लेकर महकते गेसू फिर एक बार आओ

हुस्नो शबाब लेकर दीवानावार आओ

आओ तिपां जिगर से उठने लगा धुंआ सा

बुझने दो चंद शोले कल हम नहीं रहेंगे


अपनी उदास आँखों में डूबने दो शब भर 

इन दिल फ़रेब होंठों को चूमने दो शब भर

शब भर समेटने दो अपने बदन की ख़ुशबू

जी भर के देखने दो कल हम नहीं रहेंगे


नक्शो निगार छूकर जलने दो उँगलियों को

सरता क़दम बहकती चलने दो उँगलियों को

तरसी हुई जवानी महरूम रह न जाए 

पीने दो मै शहाबी कल हम नहीं रहेंगे


बस और ज़िन्दगानी आशुफ़्त:सर न होगी 

इस शब के बाद अपनी कोई सहर न होगी

मेराजे वस्ल क्या है क्या है रमूज़े हिज्राँ

ज़ाहिर कभी न होगा कल हम नहीं रहेंगे


कुछ देर में फ़लक का गोश: सुलग उठेगा

शबनम चमक उठेगी गुंच: महक उठेगा

तुमको सबा हमारे पहलू से ले चलेगी

होंगी हज़ार बातें कल हम नहीं रहेंगे


बेताब खैर मक़दम करने को हैं बहारें

देखो वो दूर तक हैं नगमात की क़तारें 

जाओ तुम्हारी दुनिया आवाज़ दे रही है

हाफ़िज़ ख़ुदा तुम्हारा कल हम नहीं रहेंगे


ख़ुश आमदीद कहना फैला के अपना दामन

कोशिश अगर करोगी होंगे चराग़ रौशन

अफ़सोस भी हमारा तुम भूल कर न करना

कल हम नहीं रहेंगे कल हम नहीं रहेंगे

शुक्रिया

 मैंने सोचा भी नहीं था मेरी मेराजे हयात 

ज़िन्दगी ऐसे मक़ामात से गुजरेगी कभी  

मुझको मालूम नहीं था मेरी तन्हाई में 

तेरे साँसों की हरारत तेरी बांहों का हिसार 

होके हमरंग किसी रोज़ ठहर जाएगा

जिसको समझा था ख़सो ख़ाक का बोसीद: हुजूम

ख़ातिरे ज़ार का मक़दूर संवर जाएगा


आज हर शै तेरी अक्कास नज़र आती है

बज़्मे आलम को नया हुस्न मिला हो जैसे

सर निगूँ होके अदब करता है ख़ुर्शीदे मजाज़

और गीती है कि क़दमों में बिछी जाती है

एक शादाबी ओ सरशारिये गुल क्या कहिए

गुलसितां मुतरिबे नाज़ाँ मेरे ऐज़ाज़ में है

और यह सब है तेरा म' जिज़:ए लुत्फ़ो नियाज़


अपनी क़िस्मत पे जो मग़रूर हूँ मैं थोड़ा है

गर जो दीवाना ओ मसहूर हूँ मैं थोड़ा है

जिस क़दर भी तेरा मशकूर हूँ मैं थोड़ा है

Saturday, January 6, 2024

 इक साअते गुम फेर के सा'ई नहीं देता 

कहता है कि जा मैने चुराई नहीं देता


पूछे है फ़हम कौन है पोशीदा नज़र से

ढूंढे है नज़र जिसको दिखाई नहीं देता


सरवत का अंधेरा है कि पर्दे हैं अना के

इस हाथ को वो हाथ सुझाई नहीं देता


फुर्सत नहीं बेटी को मेरा हाल जो पूछे

बेटा भी मुझे अपनी कमाई नहीं देता


हंगामे तरक्की नहीं हंगामा बपा है

इस शोर में दुनिया को सुनाई नहीं देता


आकाश से धरती का नज़म देखने वाले

बूढ़े हुए अब उनको दिखाई नहीं देता 


बदकारो खातावार खड़े चीख़ रहे हैं

चुपचाप है मासूम सफ़ाई नहीं देता


करता हूं वही जी में जो आ जाए है मेरे

काफ़िर हूं अकीदों की दुहाई नहीं देता