कौन कहता है कि आप और हम कभी
तितलियों से बात कर सकते नहीं
कौन कहता है कि लफ़्ज़ों के बग़ैर
गीत गाए जा नहीं सकते कभी
कौन कहता है धनक के रंग से
आसमां पर दिल बना सकते नहीं
कौन कहता है कि कुदरत आपको
मावराई हुस्न दिखलाती नहीं
कौन कहता है कि परियाँ अर्श की
आ नहीं सकतीं कभी आग़ोश में
कौन कहता है कि आँगन प्यार का
जुगनुओं से भर नहीं सकता कभी
कौन कहता है पहाड़ी रागनी
घर हमारे जन्म ले सकती नहीं
कौन कहता है कि फूलों की महक
पालने में गुनगुना सकती नहीं
कौन कहता है कि पूरी कायनात
बे महाबा खिलखिला सकती नहीं
कौन कहता है मसीहाई कभी
लौट कर दुनिया में आ सकती नहीं
कौन हैं ये लोग इतने वाहियात
बात फैलाते हैं बेसिर पैर की
उन तही मग्ज़ों को लेकर आइए
और हमारी बेटियाँ दिखलाइए
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