Thursday, October 3, 2024

ख़्वाब

 मैंने बचपन से आज तक ऐ दोस्त

सिर्फ़ एक ही तो ख़्वाब देखा था


ना तो दौलत की आरज़ू थी मुझे

और न शोहरत की भूख थी मुझको


मैं सियासत से दूर रहता था

और बेज़ार था तिजारत से


ना मुझे डिग्रियों की ख्वाहिश थी

ना किसी खेल में मिला तमगा 


ना कभी नौकरी की अर्ज़ी दी

ना तरक्की के पायदान चढ़े


जोड़ पाया नहीं कभी पूंजी

ना ख़रीदा जमीन का टुकड़ा


ना तो कोई मकान बनवाया

ना मेरे नाम की लगी तख़्ती 


मैं बहुत खुश था अपने ख़्वाब के साथ

तूने बिलआख़िर जिसको तोड़ दिया 


मेरे सपने को तोड़ने वाले

तेरे कांपे जरूर होंगे हाथ

No comments: