Friday, September 20, 2024

इश्क़ जिसमें गुनाह हो जाए
ऐसी दुनिया तबाह हो जाए

अक्ल जब  ख़ैरख्वाह हो जाए
दिल से कैसे निबाह हो जाए

ज़िंदगी एक बार मिलती है
सोहबते मेहरो माह हो जाए 

टिमटिमाते हैं किर्मके–शबताब
जब मुक़द्दर सियाह हो जाए

तेरे पाकीज़गी भरे सजदे
मैं करूं तो गुनाह हो जाए

ख़ालिक़ ए कायनात ने सोचा
आज तंज़ ओ मज़ाह हो जाए

गुनगुनाओ न फिर वही नग़म:
सुनते सुनते सबाह हो जाए


आपकी भी सुनेंगे हम काफ़िर
ठहरिए तो निकाह हो जाए

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