ऐसी दुनिया तबाह हो जाए
अक्ल जब ख़ैरख्वाह हो जाए
दिल से कैसे निबाह हो जाए
ज़िंदगी एक बार मिलती है
सोहबते मेहरो माह हो जाए
टिमटिमाते हैं किर्मके–शबताब
जब मुक़द्दर सियाह हो जाए
तेरे पाकीज़गी भरे सजदे
मैं करूं तो गुनाह हो जाए
ख़ालिक़ ए कायनात ने सोचा
आज तंज़ ओ मज़ाह हो जाए
गुनगुनाओ न फिर वही नग़म:
सुनते सुनते सबाह हो जाए
आपकी भी सुनेंगे हम काफ़िर
ठहरिए तो निकाह हो जाए
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