Tuesday, May 12, 2020

आँखें

मैं ने देखी हैं बहुत बार वो प्यारी ऑंखें
स्याह पलकों पे रखे ख़्वाब से भारी ऑंखें

अभी खुलती अभी झुकती हुई कारी आँखें
फैसला करने में नाकाम बिचारी ऑंखें

तुम फिरे वक़्त फिरा फिर गईं सारी ऑंखें
रह गईं रौनक़े जज़्बात से आरी ऑंखें

एक ही दिन में बिगाड़ा भी सँवारा भी मुझे
तुम ने जिस दिन मेरी आँखों में उतारी ऑंखें

उन दिनों सारे ख़यालात थे बहके बहके
कुछ पिलाती तो नहीं थीं वो ख़ुमारी आँखें

हम तो नादीदः ओ नादान थे नावाक़िफ़ थे
उनकी आँखों में खुली जाके हमारी ऑंखें

खेल तो जब हो कभी मैं कोई बाज़ी जीतूँ
जीतने ही नहीं देती थीं जुआरी ऑंखें

वो भी जागी थीं मेरे साथ सुबह तक 'काफ़िर'
याद आती हैं मुझे नींद की मारी ऑंखें

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