Monday, June 1, 2020

किसी वीरां जज़ीरे पर कोई ख़ाली मकां होता
न पैरों में ज़मीं होती न सर पर आसमां होता

हमारी भी हिरा होती हमारा भी कोई सीना
तभी तो बात होती जब मुख़ातिब लामकां होता

कोई होता जिसे हम अक़लो दिल की मुंसिफी देते
किसी के सामने अपना मुक़दमा भी बयां होता

उम्मीदें आरज़ूएं हसरतें यादें तमन्नाएँ
अगर आज़ादे पा होता कहाँ से मैं कहाँ होता

मेरे हमदर्दो हमदारू मेरे हमशीरो हमसाए
सभी देखा किए मेरे नशेमन को धुआं होता

जिसे आना है ख़ाली हाथ ख़ाली हाथ जाना है
जनम जितनी रज़ा लेता ख़राबे खानुमां होता

मिली जितनी भी सांसें हो गईं सब सर्फ़ जीने में
वगरना यह तही-मायः तेरे शायाने शां होता

तमाशा है तमाशा देखिए क्यों उज़्र करते हैं
न काफ़िर का धरम होता न दीने मुस्लिमां होता

Tuesday, May 12, 2020

आँखें

मैं ने देखी हैं बहुत बार वो प्यारी ऑंखें
स्याह पलकों पे रखे ख़्वाब से भारी ऑंखें

अभी खुलती अभी झुकती हुई कारी आँखें
फैसला करने में नाकाम बिचारी ऑंखें

तुम फिरे वक़्त फिरा फिर गईं सारी ऑंखें
रह गईं रौनक़े जज़्बात से आरी ऑंखें

एक ही दिन में बिगाड़ा भी सँवारा भी मुझे
तुम ने जिस दिन मेरी आँखों में उतारी ऑंखें

उन दिनों सारे ख़यालात थे बहके बहके
कुछ पिलाती तो नहीं थीं वो ख़ुमारी आँखें

हम तो नादीदः ओ नादान थे नावाक़िफ़ थे
उनकी आँखों में खुली जाके हमारी ऑंखें

खेल तो जब हो कभी मैं कोई बाज़ी जीतूँ
जीतने ही नहीं देती थीं जुआरी ऑंखें

वो भी जागी थीं मेरे साथ सुबह तक 'काफ़िर'
याद आती हैं मुझे नींद की मारी ऑंखें

Thursday, May 7, 2020

अभी मैं जिंदा हूँ


ऐ दैरो हरम के मुख्तारो
ऐ मुल्को जुबां के सरदारो

सुन लो कि अभी मैं जिंदा हूँ

ऐ ताज बसर मीज़ान बकफ़
तुम अदलो हक़ीक़त भूल गए
काग़ज़ की रसीदों में लिखकर
इंसान की क़ीमत भूल गए
संभलो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

माना कि तबीयत भारी है
और भूख बदन पर तारी है
पानी भी नहीं शिरयानों में
पर सांस अभी तक जारी है
ठहरो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

सुन लो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

ऐ सा'द सुखन फर्ज़ान:क़लम
ये शोरिशे 'दानम' बंद करो
रोते भी हो तुम पैसों के लिए
रहने दो ये मातम बंद करो
बख्शो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

सुन लो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

आईने मईशत किसने लिखे
आदाबे सियासत किसने लिखे
है जिनमें तुम्हारी आग़ाई
वो बाबे शरीयत किसने लिखे
लिक्खो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

सुन लो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

ऐ पंदगराने दीनो धरम
पैग़म्बरो का'बा मेरे हैं
मंदिर भी मेरे भगवान मेरे
गुरूद्वारे कलीसा मेरे हैं
निकलो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

सुन लो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

कह दो जाकर सुल्तानों से
ज़र्दारों से ऐवानों से
पैकारे तमद्दुन के हामी
बे नंग सियासतदानों से
कह दो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

सुन लो कि अभी मैं ज़िन्दा हूँ

Wednesday, January 22, 2020

आए हैं आज अपने ही मेहमां बने बने
वीरान क्यूँ रहें तेरे ज़िन्दां बने बने

पूछो न कौन थे मेरे आबा-ओ-अम्बिया'
कुछ याद ही नहीं मुझे इनसां बने बने

तस्वीर से हमारी न पहचान हो सके
फिरते हैं कब के सूरते जानां बने बने

ले लो मेरा वतन मेरा मशरब मेरी ज़बां
हिन्दोस्तां बना लो हुकमरां बने बने

दोनों तरफ हैं वसवसे दोनों तरफ गिले
कैसे निभेगी दोस्तो नालां बने बने

हिंदी कलाम करता है काफ़िर कभी कभी
थोड़े से दिन हुए हैं मुसलमां बने बने