आजिज़ हूँ दिल से अक़्ल से तंग आ चुका हूँ मैं
किसका करूँ यकीन किसे जानता हूँ मैं
माइल दरुं जिधर है मुख़ालिफ़ उधर दिमाग़
दोनों के इख़तिलाफ़ में पिसता रहा हूँ मैं
आते नहीं गिरफ़्त में असरारे बेख़ुदी
साग़र कभी सुबू से नबर्द आज़मा हूँ मैं
मिलता नहीं सुकून कहीं भी तेरे बग़ैर
आजा कि अपने आप से घबरा गया हूँ मैं
बेसूद हो चुकी मेरी काविश विसाल की
तेरा पता मिला है मगर लापता हूँ मैं
जाती है ख़ाक उड़ के दरो बाम तक हुनूज़
कूचे में तेरे आज भी नाला रसा हूँ मैं
काफ़िर हूँ फिर तराश ही लूँगा सनम मज़ीद
हरजाई तू अगर है तो कब पारसा हूँ मैं
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