Tuesday, September 25, 2012

फूलों की बग़ावत

कोई तितली करे परवाज़ और मादूम हो जाए
कोई बुलबुल रगे आवाज़ से महरूम हो जाए
शहादत यूँ भी होती है

न कोई अब्र गरजा था न कोई बर्क चमकी थी
मुझे बस याद है ख़ामोशियों के बाद ख़ामोशी
हवा ठहरी हवाओं में ज़मीं के बादबाँ ठहरे
मेरी आँखों से निकले आँसुओं में आसमाँ ठहरे
गुलों ने जब ग़ुलामी की सलीबें तोड़ कर फेकीं
बग़ावत यूँ भी होती है

कोई क़ीमत मरासिम की न कोई क़द्र जानों की
शहर में हर तरफ़ लूटी गई अस्मत मकानों की
सियासत ने दिए अक़वाम को अतवारे हैवानी
सरे बाज़ार इन्साँ ने बहाया ख़ूने इन्सानी
न आई रास फूलों को शिकायत बाग़बानों की
अदावत यूँ भी होती है

गुलों ने शाख़ छोड़ी गुलशनों से दश्त में आए
अमीने रंगो बू ने खूँ बहाए कहर बरपाए
कहीं नर्गिस कहीं मरियम कहीं सुम्बुल कहीं सूसन
क़तारें यासमीनों की गली कूचों में खेमाज़न
ज़हर आमेज़ थी ख़ुशबू तहलका ख़ेज़ थे साए
क़यामत यूँ भी होती है