Friday, September 17, 2010

किसे मुहब्बत हुई थी मुझसे

हजारों सदियाँ गुज़र चुकी हैं
मगर हमारी रविश न बदली
छुपाये ख़ंजर उठाये पत्थर
हमारी खुद-ग़रज़ियाँ वही हैं

कोई न अपनी अना से बाहर
पराये ग़म से न ख़्वार कोई
सब अपनी अपनी ज़ुबां के कैदी
सब अपने अपने जुनूं के दरिया

वही है नश्वो-नुमा तुम्हारी
मेरी नसों में वही लहू है
इसीलिए अजनबी हैं दोनों
हमारे मसलक अलाहदा हैं

तुम्हारी किस्मत मेरा मुकद्दर
ज़माना ज़ालिम बिचारी उल्फत
फ़ुज़ूल बकवास कोरी बातें
सुकून पाने के सब बहाने

किसे मुहब्बत हुई थी मुझसे ?
तुम्हारी परवाह मुझको थी क्या ?
तुम अपनी तकमील कर रही थीं
मैं अपने दिल से उलझ रहा था