Thursday, August 6, 2009

अलविदा

दिल गरिफ्तारे ग़म हो न जाए कहीं
रोक लो आंख नम हो न जाए कहीं

ये इमारत ये दीवार ये साइबां
ऐसी दुनिया मुझे फिर मिलेगी कहाँ

और अगर मिल भी जाए मेरे दोस्तो
क्या मज़ा मैं रहूँ और तुम न रहो

तुम से आबाद है दिल की दुनिया मेरी
है तुम्ही से मुकम्मल मेरी ज़िन्दगी

तुम से गुलनार मेरी ज़मीने वतन
तुमसे गुलज़ार मेरे चमन दर चमन

जब भी देखूँगा बीते दिनों की तरफ़
जब भी आऊंगा इन रास्तों की तरफ़

जब भी घर होके आएगी बादे सबा
जब भी महकेगी खुश्बूए गुल से फिज़ा

जब भी कोई नई दोस्ती पाऊँगा
जब भी ख़ुद को कहीं अजनबी पाऊँगा

जब भी थक जायेंगे चलते चलते कदम
जब भी घिरने लगेंगे ज़माने के ग़म

जब भी सोने न देंगी परेशानियाँ
जब भी मुश्किल में डालेंगी नादानियां

याद आओगे तुम मुझको बे इख़्तियार
आंख हो जायेगी और भी अश्कबार

आख़िर इस तरह महफ़िल सजाते हो क्यों
मेरे जाने की खुशियाँ मानते हो क्यों

मैं ये दौलत गंवाना नहीं चाहता
सच तो ये है मैं जाना नहीं चाहता

रौशनी बन के मुझको बिखर जाने दो
ज़िन्दगी बन के मुझको ठहर जाने दो

कुछ कहो अलविदा मत कहो इस जगह
कुछ करो वक्त को रोक लो इस जगह

रोक लो बस खुदा के लिए रोक लो
आज मुझ को सदा के लिए रोक लो